स्काउट में मिट्टी के तेल का स्टोव या गैस स्टोव से भोजन कैसे पकाएं
स्काउट में मिट्टी के तेल का स्टोव या गैस स्टोव से भोजन कैसे पकाएं
स्काउट/गाइड को शिविर अथवा हाइक में उन्हें ठीक प्रकार मिट्टी के तेल के स्टोव या गैस स्टोव जलाना आना चाहिए। जंगल में जहां सूखी लकड़ी उपलब्ध हो उसमें खाना बनाया जा सकता है।
शिविर अथवा रैलियों में स्काउट/गाइड स्वय खाना बनाते हैं। अतः प्रत्येक स्काउट/गाइड का खुले में दो प्रकार का भोजन, जिसमें सब्जी-रोटी या दाल-रोटी अथवा दाल-भात (दाल-चावल) बनाना आना चाहिए तथा चाय कॉफी भी बना सके।
जो बच्चे अपने घरों में खाना बनाने में सहयोग करते हैं। उन्हें शिविरों में खुले में भोजन तैयार करने में कोई कठिनाई नहीं होती, घर पर गैस चूल्हें पर भोजन पकाना आसान है जबकि खुले मैदान में जहाँ हवा चल रही हो, धूप हो, वहाँ खाना पकाना कठिन कार्य है।
भोजन बनाने से पूर्व अनेक बातों का ध्यान रखना चाहिए। कितने लोग खाने वाले हैं। उस हिसाब से आटा, चावल, दाल, मसाले, तेल आदि की मात्रा को ध्यान में रखना होगा। नमक, मिर्च कितना हो, पानी की मात्रा उस चीज को पकाने में कितनी होगी, वह चीज पक गई है या अभी कच्ची है, चाय या कॉफी बनाते समय पानी, चाय पत्ती, चीनी, कॉफी की मात्रा पर विशेष ध्यान देना होगा।
प्रत्येक व्यक्ति को भोजन बनाना सीखना चाहिए। जीवन में कभी ऐसे अवसर भी आ जाते हैं, जब भोजन बनाना पड़ सकता है। इस कला को बचपन में सीखना आसान है। स्काउट/गाइड पाककला में प्रवीण होते हैं। घर में वे अपने माता-पिता, भाई-बहिन हाथ बंटाते रहते हैं और उनके प्रिय बन जाते हैं। बड़े और अन्य कुटुम्बी जनों होकर वे अपने परिवार की समय बेसमय मदद कर उन्हें सुख पहुंचाते हैं। आधुनिक युग में जहां पत्नी भी नौकरी करती हो, वह दोहरा बोझ कैसे सह सकती है? अतः पुरुष वर्ग के लिये भोजन बनाना और घर के अन्य कामों में हाथ बटाना एक आनवायता बनती जा रही है। जिन घरों में नौकरी कर रही पत्नी की मदद नहीं की जाती वहां किन्तु एकल परिवार में तो पुरुष द्वारा भोजन, चाय तथा घर के अन्य कार्यों में पली तनाव, कलह और अशांति रहती है। संयुक्त परिवारों में तो यह बात खप सकती है, की मदद को अनिवार्य कर दिया है। कल्पना कीजिये किसी एकल परिवार में जहां दो बच्चे स्कूल जाते हों यदि पत्नी बीमार पड़ जाय तो क्या दशा होगी उस परिवार की। बच्चों को शायद भूखा ही सो जाना पड़ेगा।
स्काउट/गाइड को शिविर अथवा हाइक में उन्हें ठीक प्रकार मिट्टी के तेल के स्टोव या गैस स्टोव जलाना आना चाहिए। जंगल में जहां सूखी लकड़ी उपलब्ध हो उसमें खाना बनाया जा सकता है।
शिविर अथवा रैलियों में स्काउट/गाइड स्वय खाना बनाते हैं। अतः प्रत्येक स्काउट/गाइड का खुले में दो प्रकार का भोजन, जिसमें सब्जी-रोटी या दाल-रोटी अथवा दाल-भात (दाल-चावल) बनाना आना चाहिए तथा चाय कॉफी भी बना सके।
जो बच्चे अपने घरों में खाना बनाने में सहयोग करते हैं। उन्हें शिविरों में खुले में भोजन तैयार करने में कोई कठिनाई नहीं होती, घर पर गैस चूल्हें पर भोजन पकाना आसान है जबकि खुले मैदान में जहाँ हवा चल रही हो, धूप हो, वहाँ खाना पकाना कठिन कार्य है।
भोजन बनाने से पूर्व अनेक बातों का ध्यान रखना चाहिए। कितने लोग खाने वाले हैं। उस हिसाब से आटा, चावल, दाल, मसाले, तेल आदि की मात्रा को ध्यान में रखना होगा। नमक, मिर्च कितना हो, पानी की मात्रा उस चीज को पकाने में कितनी होगी, वह चीज पक गई है या अभी कच्ची है, चाय या कॉफी बनाते समय पानी, चाय पत्ती, चीनी, कॉफी की मात्रा पर विशेष ध्यान देना होगा।
प्रत्येक व्यक्ति को भोजन बनाना सीखना चाहिए। जीवन में कभी ऐसे अवसर भी आ जाते हैं, जब भोजन बनाना पड़ सकता है। इस कला को बचपन में सीखना आसान है। स्काउट/गाइड पाककला में प्रवीण होते हैं। घर में वे अपने माता-पिता, भाई-बहिन हाथ बंटाते रहते हैं और उनके प्रिय बन जाते हैं। बड़े और अन्य कुटुम्बी जनों होकर वे अपने परिवार की समय बेसमय मदद कर उन्हें सुख पहुंचाते हैं। आधुनिक युग में जहां पत्नी भी नौकरी करती हो, वह दोहरा बोझ कैसे सह सकती है? अतः पुरुष वर्ग के लिये भोजन बनाना और घर के अन्य कामों में हाथ बटाना एक आनवायता बनती जा रही है। जिन घरों में नौकरी कर रही पत्नी की मदद नहीं की जाती वहां किन्तु एकल परिवार में तो पुरुष द्वारा भोजन, चाय तथा घर के अन्य कार्यों में पली तनाव, कलह और अशांति रहती है। संयुक्त परिवारों में तो यह बात खप सकती है, की मदद को अनिवार्य कर दिया है। कल्पना कीजिये किसी एकल परिवार में जहां दो बच्चे स्कूल जाते हों यदि पत्नी बीमार पड़ जाय तो क्या दशा होगी उस परिवार की। बच्चों को शायद भूखा ही सो जाना पड़ेगा।
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