स्काउट में बिना बर्तन भोजन कैसे बनायें
मनुष्य जीवन में कभी ऐसी भी स्थिति आ जाय कि उसके पास मात्र कुछ राशन जैसे-आटा, चावल, दाल, आलू, प्याज, बैंगन, नमक हो किंतु कोई पकाने का बर्तन न हो तो क्या वह बिना कुछ खाये सो जाऐगा ऐसी स्थिति फौज में अथवा पर्वतरोहण में आ जाती है। प्राचीन काल में तो शिकारी अपने शिकार की खोज में जंगलों में भटक जाते थे और उन्हें किसी सुरक्षित स्थान जैसे ऊँची चट्टान या पेड़ पर रात गुजरानी पड़ती थी। ऐसी स्थिति में शरीर में ऊर्जा बनाये रखने के लिये भोजन आवश्यक हो जाता है।
स्काउट/गाइड बिना बर्तनों के भी अपना खाना तैयार कर लेते हैं और पर्याप्त भोजन पा लेते हैं।
बिना बर्तन के वे देश-काल-परिस्थितियों का अवलोकन कर संसाधन जुटा लेते हैं अथवा किसी पत्थर को साफ कर उस पर आटा गूंथ लेते हैं। अब कोई ऐसी लकड़ी जैसे बांस या फलदार अथवा जिससे कोई नुकसान न हो, ऐसी लकड़ी को छीलकर, धोकर उसमें आटे की लम्बी लड़ बनाकर उस लकड़ी पर लपेट कर जली हुई आग पर पका लेते हैं। उसे घुले पत्तल में रखते जाते हैं। आलू को कोयलों में पकाकर उसका बाहरी छिलका हटाकर नमक डाल कर सब्जी के रूप में खा सकते हैं
राजस्थान की बाटी और चूर्मा प्रसिद्ध भोज्य पदार्थ है। आटे की बाटी बनाकर गोबर के सूखे कण्डों की आग में आटे की लोई बनाकर उसके भीतर आग से भुने आलू मसलकर उसमें नमक, मिर्च व प्याज की बारीक कतरन डालकर बाटी बनाई जा सकती है। उसकी राख हटाकर अथवा जलने पर बाहरी परत हटाकर बाटी का आनन्द लिया जा सकता है। यदि स्लेटी पत्थर उपलब्ध हो तो उस पर तवे की भांति रोटियाँ भी बनाई जा सकती हैं।
चावल व दाल पकाना हो तो किसी साफ कपड़े की पोटली तैयार करें, चावल या दाल को धो लें। पोटली में रखकर पानी में कुछ देर तक भीगने दें। अब पास में एक गड्ढा खोदें। उसमें नीचे और चारों ओर पत्ते रख दे। चावल या दाल की पोटली उसमें रख दें। पत्ते ऊपर से भी बिछा दें, उसके ऊपर मिट्टी चढ़ाकर ढक दें और ऊपर से खूब आग जलायें। कुछ समय बाद गमी से दाल या चावल पक जायेंगे। तो वहाँ पर एक या डेढ़ घंटे लग सकते हैं। आग हटाकर और मिट्टी-पत्ते हटाकर पोटली बाहर निकालें । उसे दोनें या पत्तल में रखकर खा सकते हैं। इसी प्रकार आप खिचड़ी या तहरी भी बना सकते हैं। दोनों में पानी भी गर्म किया जा सकता है?
स्काउट/गाइड बिना बर्तनों के भी अपना खाना तैयार कर लेते हैं और पर्याप्त भोजन पा लेते हैं।
बिना बर्तन के वे देश-काल-परिस्थितियों का अवलोकन कर संसाधन जुटा लेते हैं अथवा किसी पत्थर को साफ कर उस पर आटा गूंथ लेते हैं। अब कोई ऐसी लकड़ी जैसे बांस या फलदार अथवा जिससे कोई नुकसान न हो, ऐसी लकड़ी को छीलकर, धोकर उसमें आटे की लम्बी लड़ बनाकर उस लकड़ी पर लपेट कर जली हुई आग पर पका लेते हैं। उसे घुले पत्तल में रखते जाते हैं। आलू को कोयलों में पकाकर उसका बाहरी छिलका हटाकर नमक डाल कर सब्जी के रूप में खा सकते हैं
राजस्थान की बाटी और चूर्मा प्रसिद्ध भोज्य पदार्थ है। आटे की बाटी बनाकर गोबर के सूखे कण्डों की आग में आटे की लोई बनाकर उसके भीतर आग से भुने आलू मसलकर उसमें नमक, मिर्च व प्याज की बारीक कतरन डालकर बाटी बनाई जा सकती है। उसकी राख हटाकर अथवा जलने पर बाहरी परत हटाकर बाटी का आनन्द लिया जा सकता है। यदि स्लेटी पत्थर उपलब्ध हो तो उस पर तवे की भांति रोटियाँ भी बनाई जा सकती हैं।
चावल व दाल पकाना हो तो किसी साफ कपड़े की पोटली तैयार करें, चावल या दाल को धो लें। पोटली में रखकर पानी में कुछ देर तक भीगने दें। अब पास में एक गड्ढा खोदें। उसमें नीचे और चारों ओर पत्ते रख दे। चावल या दाल की पोटली उसमें रख दें। पत्ते ऊपर से भी बिछा दें, उसके ऊपर मिट्टी चढ़ाकर ढक दें और ऊपर से खूब आग जलायें। कुछ समय बाद गमी से दाल या चावल पक जायेंगे। तो वहाँ पर एक या डेढ़ घंटे लग सकते हैं। आग हटाकर और मिट्टी-पत्ते हटाकर पोटली बाहर निकालें । उसे दोनें या पत्तल में रखकर खा सकते हैं। इसी प्रकार आप खिचड़ी या तहरी भी बना सकते हैं। दोनों में पानी भी गर्म किया जा सकता है?
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