कम्पास और मानचित्र की जानकारी व सोलह दिशाओं का ज्ञान

कम्पास की जानकारी (Knowledge of Compass) कम्पास की सई सदैव उत्तर दिशा की ओर रहती है। उत्तर दिशा की सही स्थिति ध्रुव तारा है किन्तु मैग्नेटिक कम्पास की सुई ठाक ध्रुव तारे की ओर न होकर कुछ पश्चिम की ओर मुड़ी होती है। इसका कारण यह है कि उत्तरी ध्रुव स लगभग 1400 मील कनाड़ा के उत्तर में एक शक्तिशाली बिन्दु है जो मैग्नेटिक उत्तर को दर्शाता से प्रत्येक स्काउट/गाइड को दिशाओं का ज्ञान तथा सोलह दिशाओं की जानकारी होनी चाहिए। इस हेतु कम्पास एक सुलभ साधन है। चुम्बकीय कम्पास में एक सुई होती है जो स्वतंत्र रूप से धूमती रहती है। यदि किसी समतल स्थान पर कम्पास को रख दिया जाय तो यह सुई स्थिर होकर उत्तर दिशा प्रदर्शित करती है। उत्तर तीन प्रकार के हैं-
True North (वास्तविक उत्तर) ध्रुव तारे से, ,
Magnetic North (चुम्बकीय उत्तर) कम्पास से तथा
Grid North मानचित्र से से ज्ञात किया जाता है।

सोलह दिशाओं का ज्ञान

मुख्य चार दिशायें हैं-उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम ।
दो दिशाओं के बीच की अर्द्धक लेने पर कुल आठ दिशायें बन जाती है-उत्तर, उत्तर-पूर्व, पूर्व, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम, उत्तर-पश्चिम, इसी प्रकार उक्त आठों के बीच की अर्द्धक से कुल सोलह दिशायें बन जायेंगी। इन दिशाओं का नामकरण उत्तर और दक्षिण को प्रमुख मानकर किया जाता है।
शुद्धता की दृष्टि से उक्त दिशाओं के स्थान पर गणितीय विधि अधिक उपयोगी है। किसी एक बिन्दु पर कुल 360° के कोण होते हैं। अतः कोणिक दूरी में दिशाओं को | जानने की विधि अधिक शुद्ध है। सोलह दिशाओं के कोणिक नाम निम्नांकित हैं-
उ.उ.पू. (NNE)322.5 द.द.प. (SSW)-202.5 उ.पू. (NE)3450 द.प. (SW)-225 पू.उ.पू. (ENE)-67.5 प.द.प. (WSW)=247.5 पूर्व (E)=90° पू.द.पू. (ESE)-112.5 प.उ.प. (WNW)-292-5 द.पू. (SE)-135 ( पश्चिम (W)=270 द.द.पू. (SSE)- 157.5 दक्षिण (S)-180 उ.प. (NW)=315 उ.उ.प. (NNW)-337.5 उत्तर (N)-360


इस कोणिक विधि का लाभ यह है कि इसकी सहायता से सूक्ष्म से सूक्ष्म गणना की जा सकती हैं। भौगोलिक उत्तर (True North) तथा चुम्बकीय उत्तर का अन्तर चुम्बकीय अन्तर (Magnetic Variation) कहलता है। प्रत्येक मानचित्र में यह दाया रहता है।

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