फैक्ट्री का अध्ययन और मजदूरों के प्रति सम्मान प्रकट करना।
फैक्ट्री का अध्ययन और मजदूरों के प्रति सम्मान प्रकट करना।
क्या आपने कभी सोचा कि जिन पुस्तकों को हम पढ़ रहे हैं, जिन कापियों में हम लिखते हैं, जो वस्त्र हम पहन रहे हैं, अथवा जो भी सामग्री हम प्रयोग में ला रहे हैं, वह कहाँ से आती है, इन्हें कौन बनाता है, जो चाय, कॉफी, चीनी, बिस्कुट नमकीन आदि हम उपयोग कर रहे हैं, अथवा जीवन में काम आने वाली समस्त वस्तुओं का निर्माण कहाँ से हो रहा है, इन प्रश्नों का उत्तर आपको किसी मिल या फैक्ट्री में जाकर मित सकता है।
स्काउट गाइड की इस जिज्ञासा की पूर्ति के लिये उन्हें किसी फैक्ट्री मिल या कारखाने में ले जाना होगा, जहाँ मजदूर अपना खून-पसीना बहाकर मेहनत कर उत्पादन करता है, किंतु उसका समाज में कोई सम्मान नहीं। सम्मान उसका होता है जो मालिक है, पूँजीपति या बिचौलिया है। मेहनत कोई करता है और मौज कोई उड़ाता है। यूरोप और अमेरिका में मजदूर की वही इज्जत है जो मालिक की। वहाँ जबकि भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। श्रमिक वर्ग और उच्च वर्ग की मजदूरी वेतन न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है, मजदूरी/वेतन में जमीन आसमान का फर्क है। उच्च वर्ग अर्थात् अमीर मजदूर की मेहनत के फलस्वरूप फलते-फूलते हैं।
जबकि मजदूर बेचारा जहाँ का तहाँ रहकर जीवन समाप्त कर लेता है।
स्काउट/गाइड की उक्त जिज्ञासा की पूर्ति हेतु स्काउटर गाइडर के नेतृत्व में स्काउट गाइड टोली पेपर एण्ड पल्प मिल लाल कुआँ पहुंची। प्रबन्धकों से अनुमति लेकर एक गाइड के मार्ग दर्शन में मिल दिखाई गई। विभिन्न मशीनों पर काम कर रहे मजदूरों और कर्मचारियों से स्काउट गाइड मिलें, उन्हें सैल्यूट कर बायाँ हाथ मिलाया तथा उनके काम के घंटे, वेतन अन्य सुविधाओं की जानकारी ली, उनके पारिवारिक जीवन से संबंधित जानकारी प्राप्त की, उनके काम की प्रशंसा की और उनके द्वारा किये जा रहे राष्ट्र-निर्माण के कार्यों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट की।
साथ में आये गाइड ने फैक्ट्री के उत्पादन, प्रबंधन और उत्पादित कागज के बाजार के बारे में जानकारी दी। मिल प्रबन्धन ने अतिथि कक्ष में बिठाकर फल, जूस देकर स्काउट/गाइड का सम्मान किया। प्रत्येक को एक-एक डायरी दी गई, प्रबंधन का धन्यवाद कर टोली वापस घर आ गई।
क्या आपने कभी सोचा कि जिन पुस्तकों को हम पढ़ रहे हैं, जिन कापियों में हम लिखते हैं, जो वस्त्र हम पहन रहे हैं, अथवा जो भी सामग्री हम प्रयोग में ला रहे हैं, वह कहाँ से आती है, इन्हें कौन बनाता है, जो चाय, कॉफी, चीनी, बिस्कुट नमकीन आदि हम उपयोग कर रहे हैं, अथवा जीवन में काम आने वाली समस्त वस्तुओं का निर्माण कहाँ से हो रहा है, इन प्रश्नों का उत्तर आपको किसी मिल या फैक्ट्री में जाकर मित सकता है।
स्काउट गाइड की इस जिज्ञासा की पूर्ति के लिये उन्हें किसी फैक्ट्री मिल या कारखाने में ले जाना होगा, जहाँ मजदूर अपना खून-पसीना बहाकर मेहनत कर उत्पादन करता है, किंतु उसका समाज में कोई सम्मान नहीं। सम्मान उसका होता है जो मालिक है, पूँजीपति या बिचौलिया है। मेहनत कोई करता है और मौज कोई उड़ाता है। यूरोप और अमेरिका में मजदूर की वही इज्जत है जो मालिक की। वहाँ जबकि भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। श्रमिक वर्ग और उच्च वर्ग की मजदूरी वेतन न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है, मजदूरी/वेतन में जमीन आसमान का फर्क है। उच्च वर्ग अर्थात् अमीर मजदूर की मेहनत के फलस्वरूप फलते-फूलते हैं।
जबकि मजदूर बेचारा जहाँ का तहाँ रहकर जीवन समाप्त कर लेता है।
स्काउट/गाइड की उक्त जिज्ञासा की पूर्ति हेतु स्काउटर गाइडर के नेतृत्व में स्काउट गाइड टोली पेपर एण्ड पल्प मिल लाल कुआँ पहुंची। प्रबन्धकों से अनुमति लेकर एक गाइड के मार्ग दर्शन में मिल दिखाई गई। विभिन्न मशीनों पर काम कर रहे मजदूरों और कर्मचारियों से स्काउट गाइड मिलें, उन्हें सैल्यूट कर बायाँ हाथ मिलाया तथा उनके काम के घंटे, वेतन अन्य सुविधाओं की जानकारी ली, उनके पारिवारिक जीवन से संबंधित जानकारी प्राप्त की, उनके काम की प्रशंसा की और उनके द्वारा किये जा रहे राष्ट्र-निर्माण के कार्यों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट की।
साथ में आये गाइड ने फैक्ट्री के उत्पादन, प्रबंधन और उत्पादित कागज के बाजार के बारे में जानकारी दी। मिल प्रबन्धन ने अतिथि कक्ष में बिठाकर फल, जूस देकर स्काउट/गाइड का सम्मान किया। प्रत्येक को एक-एक डायरी दी गई, प्रबंधन का धन्यवाद कर टोली वापस घर आ गई।
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